Sunday, July 26, 2015

मैं दर - बदर, मेरी रूह बेखबर

In the midst of living materialistic life, I feel as I lose my "self" and life simply drags along. These lines are my attempt to poetize my search of "self". Read it in the context of some wanderer who is search of the "truth". 

Title is
"मैं दर - बदर, मेरी रूह बेखबर"

तू मेरा साया या मैं तेरा सरमाया,
पर दोनों मैं फर्क नज़र ना आया,
मिला ना तेरा हमसाया एक पल भर,
क्यूंकि मैं दर - बदर, मेरी रूह बेखबर

ज़िंदगी की तलाश मैं दिल शोरो-खरोश  हे,
ज़िंदगी की आखरी देहलीज़ पे हर दिल चुप हे खामोश हे,
जीते जी महसूस हो इस ज़िंदगी का सुरूर,
क्यूंकि मैं दर - बदर, मेरी रूह बेखबर

साँसें चलती रही, ज़िंदगी बढ़ती रही,
तम्मान्नाओँ के बाज़ार मैं साँस घुटती रही,
ख्वाहिशों को कभी रोका नहीं एक बार,
क्यूंकि मैं दर - बदर, मेरी रूह बेखबर

इंसान बने रहने की फ़िराक मैं जीता रहा गुमसुम
दुनिया की भीड़ मैं खुद को खोया रखा हरदम,
खोजा नहीं खुद को अपने अंदर, बस रहा बेफिक्र,
क्यूंकि मैं दर - बदर मेरी रूह बेखबर

आसमान पाने को अपनी ज़मीन को छोड़ा,
सब कुछ पाके भी ख़ुद को किया ज़ाया,
उड़ता रहा पतंग की तरह, बिना डोर बिना छोर,
क्यूंकि मैं दर - बदर, मेरी रूह बेखबर

नहीं पता मुझे क्या चाहिए,
सुकून चाहिए या खुद से रिहाई चाहिए,
मुझे तुजसे मिला दे या मुझे खुद से मिला दे कोई राहबर,

क्यूंकि मैं दर - बदर, मेरी रूह बेखबर

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